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हाथरस और स्वामी विवेकानंद व स्वामी सदानंद।

आज हाथरस अपने कुख्यात दमनकारी काण्ड के लिए ख़बरों मे है।

वैसे तो हमारी वेबसाइट का उद्देश्य डिजिटल मीडिया के माध्यम से हाथरस की सुखद अनुभूति के बारे में लिखना व बताना है।

(यह ख़बरों की वेबसाइट नही है यह वेबसाइट इस शहर की कहानियों का डिजिटल संकलन है जो आप कभी भी पढ़ सकते हैं यानि की टाईमलेस संस्करण।)

पर आजकल की स्थित देखकर मन उदास और हताश सा हो जाता है। आशा है पीड़ितों को न्याय मिलेगा।

जहां देखो वहां इसी की चर्चा है इन्हीं चर्चाओं के बीच हमें सिम्मी ग्रेवाल द्वारा ट्वीट की गई हाथरस से जुड़ी एक सकारात्मक कहानी पढ़ने को मिली जो हाथरस के अतीत के समय से जुड़ी है।

ट्वीट किया गया वृतांत इंग्लिश मे है।
स्वामी विवेकानंद (फोटो साभार: विकिपीडिया)

यह वृतांत 130 वर्ष पुराना है, हाथरस जं. स्टेशन की बैन्च पर एक सन्यासी बैठा था जो आत्म ज्ञान के लिए भारत के विभिन्न भागों की यात्रा पर था। सन्यासियों के पास कोई मुद्रा कोष या संसाधन नहीं होते हैं अत: जो भी बनता उसी से यात्रा जारी रहती है। यह सन्यासी पैदल, बैलगाड़ी और कभी कभार रेलगाड़ी से अपने दूरी तय करते हुए इस समय हाथरस जं.पर अपने अगले पड़ाव पर जाने के लिए बैठा था। उन दिनों रेलवे-स्टेशन पर बहुत ज्यादा गाड़ियां नही चलती थीं और स्टेशन पर भीड़भाड़ भी नही होती थी वैसे भी हाथरस का स्टेशन अभी भी बहुत ज्यादा भीड़भाड़ वाला नही है। ऐसे में स्टेशन मास्टर (या ए एस एम) ने बैन्च पर बैठे हुए सन्यासी को नोटिस किया इस सन्यासी के चेहरे के नैन-नक्श विशेषकर बढ़ी- बढ़ी आँखे और तीखी सीधी नाक एक विशेष अध्यात्म और तेज बिखेर रहा था। स्टेशन मास्टर ने हालचाल, कहां और कैसे पता करने के बाद वार्तालाप शुरू कर दिया और सन्यासी के ज्ञान से बहुत प्रभावित हुए। इसी प्रभाव के तहत उन्होंने सन्यासी को रात्रि विश्राम के लिए अपने घर आमंत्रित किया। स्टेशन मास्टर साहब का क्वार्टर रेलवे-स्टेशन के पास ही रेलवे काॅलोनी मे था। अध्यात्म और ज्ञान पर चर्चाओं का दौर जारी रहा और इस प्रकार दो-तीन दिन व्यतीत हो गए। अब उस संन्यासी ने अपनी यात्रा पर आगे बढ़ने के लिए विदा मांगी तो स्टेशन मास्टर ने संन्यासी को कुछ समय रूकने को बोला और भागते हुए स्टेशन गये। वहां जाकर उन्होंने मुख्य स्टेशन अधिकारी को अपना इस्तीफा सौंप दिया और उन संन्यासी को गुरू मानकर उनके साथ हो लिए।

वो संन्यासी कोई और नही बल्कि नरेन्द्र नाथ दत्त थे जो कि आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गये।


स्वामी सदानंद (फोटो साभार: विकिपीडिया)

और वो हाथरस स्टेशन के सज्जन बंगाली ए. एस. एम. साहब थे शरत चन्द्र गुप्ता जिन्होंने उस समय इस्तीफा देकर संन्यास ले लिया था आगे चलकर रामकृष्ण परमहंस मिशन के स्वामी सदानंद के नाम से जाने गए।


यह वास्तव में हाथरस की पृष्ठभूमि मे गुरू व शिष्य का एक दूसरे से मिलने का एक रोचक वृतांत है।

यह वृतांत "द लाइफ ऑफ स्वामी विवेकानंद वाई हिज इस्टर्न एण्ड वेस्टर्न डिसाइपल्स" मे पेज नंबर 220 से 224 पर वर्णित है।

आप और अधिक जानकारी के लिए अद्वैत आश्रम द्वारा 1989 में प्रकाशित इस पुस्तक को देख सकते हैं।

फोटो साभार: विकीपीडिया अमेजाॅन

ट्वीट साभार: सिम्मी ग्रेवालट्विटर




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